योग यज्ञ जप तप तीरथ ब्रतादि दान - श्री सुंदरदास जी

योग यज्ञ जप तप तीरथ ब्रतादि दान - श्री सुंदरदास जी

(कवित्त)
योग यज्ञ जप तप तीरथ ब्रतादि दान, साधन सकल नहीं याकी सरवर है । [1]
और देवी देवता उपासना अनेक भाँति, शंकर सब दूरि करि तिन ते न डर है ॥ [2]
सब ही के सीस पर पाँव दे मुकति होय, ‘सुन्दर’ कहत सो तो जनमे न मर है । [3]
मन बच काय करि अन्तर न राखै कछु, सन्तन की सेवा करै सोई निसतर है ॥ [4]

- श्री सुंदरदास जी

योग, यज्ञ, जप, तप, तीर्थाटन, व्रत और दान—ये सभी साधन मिलकर भी 'संत-सेवा' की समानता नहीं कर सकते। [1]

यदि कोई अन्य नाना प्रकार के देवी-देवताओं की साधना का परित्याग कर, केवल संतों की पावन शरणागति ग्रहण कर उनकी सेवा में संलग्न रहता है, तो भी वह परम निर्भय पद को प्राप्त कर लेता है। [2]

श्री सुंदर दास जी कहते हैं कि ऐसा भक्त मुक्ति के भी शीश पर पाँव रखकर, उसे तुच्छ मानता है, जन्म-मरण के चक्र से तो वह स्वाभाविक ही मुक्त हो जाता है। [3]

जो मन, वचन और कर्म से निष्कपट होकर संतों की अनन्य सेवा करता है, वही इस संसार-सागर से पार उतरता है। [4]