(राग विहागरौ)
प्यारी जू तैं मोहि मोल लियो ।
तेरी कृपा मदन दल जीत्यौ, तेरो जिवायो जियो॥ [1]
उमडी सैन महा मनमथ की, तैं अंधरामृत दियो ।
श्रीरसिकबिहारी कहत दीन ह्वै, धनि स्यामा को हियो॥ [2]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (15)
श्रीलालजी (कृष्ण) अपनी प्रियाजी (श्री राधा) से कहते हैं—हे प्यारी जू! आपने तो मुझे बिना मोल के अपना बना लिया है (मैं आपका बिना मोल का दास हो गया हूँ)। आपकी ही कृपा से मैंने कामदेव की विशाल सेना पर विजय प्राप्त की है; अब तो मैं आपके द्वारा दिए गए जीवन-दान से ही जीवित हूँ। [1]
जब कामदेव की सेना ने मुझ पर प्रबल आक्रमण किया तब आपने अपने अधरामृत का दान देकर मुझे नवजीवन प्रदान किया। श्रीरसिकदेवजी महाराज कहते हैं कि इस प्रकार श्रीलालजी परम दीनता का भाव प्रदर्शित करते हुए कहते हैं—"धन्य हैं श्रीश्यामा जू! धन्य है आपका यह अगाध और करुणामयी हृदय, जो मुझ जैसे दास पर निरंतर अपनी असीम कृपा की वर्षा करता है।" [2]
प्यारी जू तैं मोहि मोल लियो ।
तेरी कृपा मदन दल जीत्यौ, तेरो जिवायो जियो॥ [1]
उमडी सैन महा मनमथ की, तैं अंधरामृत दियो ।
श्रीरसिकबिहारी कहत दीन ह्वै, धनि स्यामा को हियो॥ [2]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (15)
श्रीलालजी (कृष्ण) अपनी प्रियाजी (श्री राधा) से कहते हैं—हे प्यारी जू! आपने तो मुझे बिना मोल के अपना बना लिया है (मैं आपका बिना मोल का दास हो गया हूँ)। आपकी ही कृपा से मैंने कामदेव की विशाल सेना पर विजय प्राप्त की है; अब तो मैं आपके द्वारा दिए गए जीवन-दान से ही जीवित हूँ। [1]
जब कामदेव की सेना ने मुझ पर प्रबल आक्रमण किया तब आपने अपने अधरामृत का दान देकर मुझे नवजीवन प्रदान किया। श्रीरसिकदेवजी महाराज कहते हैं कि इस प्रकार श्रीलालजी परम दीनता का भाव प्रदर्शित करते हुए कहते हैं—"धन्य हैं श्रीश्यामा जू! धन्य है आपका यह अगाध और करुणामयी हृदय, जो मुझ जैसे दास पर निरंतर अपनी असीम कृपा की वर्षा करता है।" [2]

