(राग विहागरौ)
आज सखि निरख रूप भरि नैंन।
लता ऐंन रचि सैंन मिथुन वर, बोलत अति मृदु बैंन॥ [1]
हँसत जबहि दोउ लसत दसन-दुति, सोभा कहत बनैंन।
'हित ध्रुव' निरखि सहज छवि सीवाँ, मैंन होत मन मैंन॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (91)
हे सखि! आज तू इन दिव्य युगल के रूप को अपने नेत्र भर कर निहार। लताओं के कुंज रूपी भवन में रसिक नरेश युगल ने अपनी शय्या रची है और वे परस्पर अत्यंत कोमल वाणी में वार्तालाप कर रहे हैं। [1]
जब वे दोनों हँसते हैं, तब उनके दंत-पँक्ति की कांति सुशोभित होती है, जिसकी शोभा का वर्णन करना वाणी के सामर्थ्य से परे है। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि इस सहज सौंदर्य की चरम सीमा को देखकर कामदेव का मन भी मन्मथ (मथित) हो जाता है अर्थात् वह भी सम्मोहित हो जाता है। [2]
आज सखि निरख रूप भरि नैंन।
लता ऐंन रचि सैंन मिथुन वर, बोलत अति मृदु बैंन॥ [1]
हँसत जबहि दोउ लसत दसन-दुति, सोभा कहत बनैंन।
'हित ध्रुव' निरखि सहज छवि सीवाँ, मैंन होत मन मैंन॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (91)
हे सखि! आज तू इन दिव्य युगल के रूप को अपने नेत्र भर कर निहार। लताओं के कुंज रूपी भवन में रसिक नरेश युगल ने अपनी शय्या रची है और वे परस्पर अत्यंत कोमल वाणी में वार्तालाप कर रहे हैं। [1]
जब वे दोनों हँसते हैं, तब उनके दंत-पँक्ति की कांति सुशोभित होती है, जिसकी शोभा का वर्णन करना वाणी के सामर्थ्य से परे है। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि इस सहज सौंदर्य की चरम सीमा को देखकर कामदेव का मन भी मन्मथ (मथित) हो जाता है अर्थात् वह भी सम्मोहित हो जाता है। [2]

