बलिहारी जाऊँ जक परी - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (660)

बलिहारी जाऊँ जक परी - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (660)

बलिहारी जाऊँ जक परी, बातन बहुत दंडौत।
पालत देह कुटुंब कौं, भले समझि भागौत॥

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (660)

हे बिहारीदास! श्रीमद्भागवत् के वर्तमान वक्ता मुख से तो अत्यंत सरस व्याख्यान करते हैं और बार-बार दण्डवत कर विनम्रता का प्रदर्शन भी करते हैं, किन्तु जो कुछ भेंट आती है, उससे अपनी देह-कुटुंब-परिवार का ही पालन-पोषण करते हैं। इसके विपरीत, श्री शुकदेव जी ने संपूर्ण भागवत् में संसार के विरक्ति और प्रभु-चरणों में अनन्य प्रीति का ही प्रतिपादन किया है। उन वक्ताओं की समझ पर आश्चर्य होता है जो श्रीमद्भागवत् के वास्तविक रहस्य से सर्वथा अनभिज्ञ हैं।