दोउ मिलि झूलैं आज हिंडोरैं - श्री रसिक गोविंद

दोउ मिलि झूलैं आज हिंडोरैं - श्री रसिक गोविंद

दोउ मिलि झूलैं आज हिंडोरैं॥
झूलैं ही फूलै, हंसि चितवत चितकौं चौरैं।
सघन कुंज जमुना वहि आई, तैसे ही बोलत सुक पिक मोरैं ॥ [1]
नीलाम्बर पीतांबर फर हरैं, तैसे ही दामिनि घन घोरैं।
गौर श्याम अभिराम की लखि छवि, ‘रसिक गोविन्द’ सखी तृन तोरैं॥ [2]

- श्री रसिक गोविंद

आज युगल सरकार (श्री प्रिया-प्रियतम) मिलकर हिंडोले पर झूल रहे हैं। झूलते हुए वे अत्यंत प्रफुल्लित हैं और परस्पर मंद-मंद मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को निहार कर चित्त चुरा रहे हैं। सघन कुंजों के निकट श्री यमुना जी बह रही हैं, जहाँ शुक (तोता), कोयल और मयूर मधुर स्वर में गुंजार कर रहे हैं। [1] 

एक ओर श्री प्रिया जी का नीलाम्बर और श्री श्यामसुन्दर का पीताम्बर पवन के वेग से फहरा रहा है, तो दूसरी ओर घनघोर घटाओं के बीच बिजली कौंध रही है। गौर श्याम की इस अत्यंत मनमोहक छवि को देखकर रसिक गोविन्द सखी उन पर से तृण तोड़कर (नज़र उतारकर) न्योछावर हो रही हैं। [2]