अंत अनंत साधन करै - श्री अनन्य अलि, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.60)

अंत अनंत साधन करै - श्री अनन्य अलि, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.60)

अंत अनंत साधन करै, भजन होइ नहिं लेश ।
स्वास्थ सौं वन में फिरे, फिरत भजन गहे केश ॥

- श्री अनन्य अली, श्री अनन्य अली जी की वाणी, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.60)

यद्यपि जीव आजीवन विविध साधनाओं में निरत रहे, तथापि विशुद्ध भजन का लेश मात्र भी प्राप्त करना दुष्कर है। परंतु श्री धाम वृन्दावन की महिमा अनिवर्चनीय है; यहाँ यदि कोई व्यक्ति स्वार्थवश भी विचरण करता है, तो भजन स्वयं उसे अंगीकार कर लेता है।