श्री ललिता सिखवत रस परिकर की ॥
वृषभान पुरा को बास सखीरी, पूजी आसा मो मन की॥ [1]
तुब पद पकंज सेऊं प्रेम सों, सुध न रहे कछु तन की।
ब्रज रज लिपट रहों श्री बंसी अलि, मोह नाहिं धन गुन की॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (26)
निकुंज-सेवा की आचार्या श्री ललिता सखी समस्त सखी-परिकर को दिव्य निकुंज-रस की पद्धति और रस-रीति का बोध कराती हैं। हे सखी! ऐसी कृपा हो कि मुझे वृषभानपुर (बरसाना) का वास मिले—यह मेरे मन की पूजित आशा है। [1]
यदि बरसाना का वास सुलभ हो जाए, तो मैं निरंतर श्री स्वामिनीजी (राधा रानी) के श्री चरणों की अनन्य प्रीति से परिचर्या करूँ। उस सेवा के आनंद में देह का भान पूर्णतः विस्मृत हो जाए। श्री वंशी अलि कहते हैं कि मैं सर्वदा पावन ब्रज-रज में लोटता रहूँ जिससे संसार के धन-वैभव और लोक-सम्मान का मोह मेरे चित्त को स्पर्श भी न कर सके। [2]
वृषभान पुरा को बास सखीरी, पूजी आसा मो मन की॥ [1]
तुब पद पकंज सेऊं प्रेम सों, सुध न रहे कछु तन की।
ब्रज रज लिपट रहों श्री बंसी अलि, मोह नाहिं धन गुन की॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (26)
निकुंज-सेवा की आचार्या श्री ललिता सखी समस्त सखी-परिकर को दिव्य निकुंज-रस की पद्धति और रस-रीति का बोध कराती हैं। हे सखी! ऐसी कृपा हो कि मुझे वृषभानपुर (बरसाना) का वास मिले—यह मेरे मन की पूजित आशा है। [1]
यदि बरसाना का वास सुलभ हो जाए, तो मैं निरंतर श्री स्वामिनीजी (राधा रानी) के श्री चरणों की अनन्य प्रीति से परिचर्या करूँ। उस सेवा के आनंद में देह का भान पूर्णतः विस्मृत हो जाए। श्री वंशी अलि कहते हैं कि मैं सर्वदा पावन ब्रज-रज में लोटता रहूँ जिससे संसार के धन-वैभव और लोक-सम्मान का मोह मेरे चित्त को स्पर्श भी न कर सके। [2]

