देखोरी वृन्दावन शोभा - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

देखोरी वृन्दावन शोभा - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

देखोरी वृन्दावन शोभा परम छबि को सार ।
युगल चंद्र जेहि लखत चकित ह्वै, रहत है थकित निहार॥ [1]
कुसुमित हरित प्रफुल्लित मुकुलित, झुकी अवनि तरु डार।
मंद समीर सुगंधित विचलित, शीतल अति मनुहार॥ [2]
श्री यमुना जल वीचिन सिंचित, रहत सँवारत मार।
रामसखी अनुराग वाग वर, निरुपम ललित दुवार॥ [3]

- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

हे सखी! श्री वृन्दावन की इस अनुपम शोभा को देखो, जो समस्त सौंदर्य का सार है। यहाँ की छबि को देखकर साक्षात् युगल-चन्द्र (श्री राधा-कृष्ण) भी चकित रह जाते हैं और इसे निहारते हुए सुध-बुध खो देते हैं। [1]

यहाँ के वृक्ष पुष्पों से लदे, हरे-भरे और प्रफुल्लित हैं; कलियों से लदी हुई डालियाँ रज-भूमि की ओर झुकी हुई हैं। मंद-मंद सुगन्धित पवन चल रही है, जो अत्यंत शीतल और मन को मोह लेने वाली है। [2]

श्री यमुना जी के जल की लहरें इन कुंज-कानन को सदा सिंचन करती रहती हैं और तट-प्रदेश को सँवारती रहती हैं। श्री रामसखी जी कहती हैं कि प्रेम-अनुराग के इस श्रेष्ठ बाग के द्वार अत्यंत अनुपम और सुंदर हैं। [3]