जै जै माधो मन मोहिनी श्रीराधिके - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), हरि लीला (01)

जै जै माधो मन मोहिनी श्रीराधिके - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), हरि लीला (01)

(दोहा)
जै माधो मन मोहनी, राधा प्राणाधार।
जै राधा रस बस भये, माधव प्रेम अपार॥


(पद)
जै जै माधो मन मोहिनी श्रीराधिके।
जै जै रस सिन्धु सुधा रस अगाधि के॥ [1]
रसिक विहारी जू के वेश केश आधिके।
रंग अंग अंग की उमंग सुख साधिके॥ [2]
वल्लभा लडेती लाल विप्रलम्भ वाधिके।
श्री प्रियासखी प्राण धन जीवन आह्लादिके॥ [3]

- श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), श्री हरि लीला (1)

(दोहा) 
उन श्री राधा की जय हो, जो माधव के मन को मोह लेने वाली और उनके प्राणों का आधार हैं। उन माधव की भी जय हो, जो श्री राधा के प्रेम-रस के पूर्णतः वश में हैं और जिनका प्रेम अपार एवं अनंत है।

(पद) 
माधव के मन को मोहने वाली श्री राधिका की बारंबार जय हो! आप अगाध रस-सिंधु की अमृतमयी धारा हैं, आपकी जय हो! [1]

रसिक विहारी श्री कृष्ण के वेश, विन्यास और केश-पाश की शोभा आपसे ही द्विगुणित होती है। आपके अंग-अंग से उमंग और रंग की जो आभा स्फुटित होती है, वह समस्त रसों को सिद्ध करने वाली है। [2]

आप लालजी की अत्यंत लाड़ली अत्यंत प्रिय वल्लभा हैं, जो मान का स्वरूप धारण कर रस को और अधिक परिपक्व कर देती है। आप श्यामसुन्दर की समस्त बाधाओं का शमन करने वाली हैं। हे राधा महारानी जू! श्री प्रियासखी की आप ही प्राण-धन और जीवन को आह्लाद से भर देने वाली परम निधि हैं। [3]