प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (26)

प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (26)

प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं।
प्रेम-मरम जाने बिना, मरि कोउ जीवत नाहिं॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (26)

जो प्रभु के प्रेम के बंधन में बँधकर मर जाता है, वही वास्तव में शाश्वत जीवन (अमरत्व) को प्राप्त करता है। इसके विपरीत, प्रेम के इस गूढ़ रहस्य को जाने बिना, इस संसार में देह मात्र से जीवित रहने वाला व्यक्ति रसिकों की दृष्टि में मृत के समान है। ऐसा जीव मरने के बाद भी शाश्वत चिन्मय जीवन को प्राप्त नहीं कर पाता।