मेरो मन तौ हरि के संग गयो - श्री कुम्भनदास जी की वाणी (233)

मेरो मन तौ हरि के संग गयो - श्री कुम्भनदास जी की वाणी (233)

(राग नट)
मेरो मन तौ हरि के संग गयो।
नांहिन काहू कों दोस री माई, नैननि के घालें पर-बस भयो ॥ [1]
नंद-कुमार जब हीं दृष्टि परे, स्यामरूप अपने द्वार ह्वै अंतर लयो।
'कुंभनदास' प्रभु गिरिधरन कों कहा हौं कहोंरी, इननु अपबल मूसि दयो॥ [2]

- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (233)

हे सखी! मेरा मन तो अब श्री कृष्ण के संग ही चला गया है। इसमें किसी और का कोई दोष नहीं है, यह तो मेरे इन नेत्रों की ढिठाई है जिन्होंने मुझे पर-बस (श्यामसुन्दर के अधीन) कर दिया है। [1]

नन्द-कुमार की श्याम छवि को निहारकर इन नेत्रों ने उन्हें हृदय के भीतर उतार लिया। कुम्भनदास जी कहते हैं कि प्रभु गिरिधर लाल के विषय में अब मैं और क्या कहूँ, उन्होंने तो मेरा चित्त-वित्त सब कुछ अपहृत कर मुझे अपने रसमय अनुराग में रंजित कर लिया है। [2]