(सवैया)
श्रीराधा पद कमल रेणु कौ, कियौ नहीं सम्यक आराधन।
आश्रय ले न भज्यौ पादांकित, श्री वृन्दावन अतिपावन॥
तिनके गूढ़ भाव सों भरे, रसिकन सों भयौ न भाषन।
निश्चित तब तक भयौ नहीं, श्याम जलधि कौ रस अवगाहन॥
- श्री अनुराग सखी जी
यदि किसी ने श्री राधा के चरण-कमलों की रज की सम्यक उपासना नहीं की और श्री वृन्दावन की उस पावन रज का आश्रय नहीं लिया जो उनके चरण-चिह्नों से अंकित है; तथा श्री राधा को नित्य लाड़ लड़ाने वाले वृन्दावन के प्रेमी-रसिकों का सत्संग नहीं किया, तो उसके लिए श्री श्यामसुन्दर रूपी रस-सागर में अवगाहन करना सर्वथा असंभव है।
श्रीराधा पद कमल रेणु कौ, कियौ नहीं सम्यक आराधन।
आश्रय ले न भज्यौ पादांकित, श्री वृन्दावन अतिपावन॥
तिनके गूढ़ भाव सों भरे, रसिकन सों भयौ न भाषन।
निश्चित तब तक भयौ नहीं, श्याम जलधि कौ रस अवगाहन॥
- श्री अनुराग सखी जी
यदि किसी ने श्री राधा के चरण-कमलों की रज की सम्यक उपासना नहीं की और श्री वृन्दावन की उस पावन रज का आश्रय नहीं लिया जो उनके चरण-चिह्नों से अंकित है; तथा श्री राधा को नित्य लाड़ लड़ाने वाले वृन्दावन के प्रेमी-रसिकों का सत्संग नहीं किया, तो उसके लिए श्री श्यामसुन्दर रूपी रस-सागर में अवगाहन करना सर्वथा असंभव है।

