ज्यों नवशिशु सों वानरी सद्य जात सुत गाय - ब्रज के दोहे

ज्यों नवशिशु सों वानरी सद्य जात सुत गाय - ब्रज के दोहे

ज्यों नवशिशु सों वानरी, सद्य जात सुत गाय।
त्यों तव पादपलाक्ष सों, नहिं मो मन बिलगाय॥

- ब्रज के दोहे

जैसे वानरी अपने नवजात शिशु से, और गाय अपने अभी जन्मे बछड़े से अलग नहीं होती। उसी प्रकार हे श्री राधा महारानी जू! मेरा मन भी आपके श्री चरण-कमलों से तनिक भी अलग न हो।