बिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (32)

बिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (32)

(राग केदारौ)
बिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी।
बदन-बदन जोरें मदन लडावत, नूपुर के सूर मिलि बलया की बजनी॥ [1]
पुलकि-पुलकि तन आनन्द मगन मन, मधुरे बचन स्रवन सुनि सजनी ।
श्रीबीठलविपुल रस-रसिक बिहारी बस, नव त्रिया-तिलक सुरति-जीति-गजनी॥ [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (32)

परस्पर में विट्ठल विपुल सखी श्री श्यामा-श्याम के नित्य-विहार का चित्रण कर रही हैं—
कुंज की इस दिव्य रजनी (रात्रि) में प्रियतमा श्री राधा और प्रियतम श्री लाल (कृष्ण) रस-विलास कर रहे हैं। वे मुख से मुख जोड़कर परस्पर प्रेम की क्रीड़ा कर रहे हैं, जहाँ उनके नूपुरों के स्वर और कंगनों की खनक से एक मधुर संगीत उत्पन्न हो रहा है। [1]

तन पुलकित हो रहे हैं और मन परमानंद में मग्न है। हे सजनी! दूल्हा-दुल्हन की इस रस-रहस्यमयी मधुर वाणी को श्रवण तो करो। श्री विट्ठलविपुल देव जी कहते हैं कि विपुल-रस के रसिक श्री बिहारीलाल अब पूर्णतः उन नवल-किशोरी (श्री राधा) के वश में हैं जो अपने प्रेम की विजय की गर्जना करने वाली समस्त नव-नायिकाओं में शिरोमणि हैं। [2]