(कवित्त)
एहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू की,
जानि अति लघु दृष्टि कृपा की ढरीजियै। [1]
भूली हौं मारग तुम दीजिये बताय मोय,
करुनानिधान आप अपनाय लीजियै॥ [2]
सुन्दर सुजान एहो कहत फिरत तेरी,
तेहूँ अपनाई मोई आपनी गनीजियै। [3]
वृन्दावन राजरानी तुम सों पुकार मेरी,
प्रेमसखी दासिन की दासी हू करीजियै॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (43)
हे सुकुमारी (श्री राधा)! आप कुंज-बिहारी श्री कृष्ण के प्राणों की प्यारी हैं। मेरी अल्पता को जानकर अपनी कृपा-दृष्टि मुझ पर डालिये। [1]
मैं जीवन का वास्तविक मार्ग भूल गई हूँ, कृपा करके मुझे सही पथ दिखलाइये। हे करुणानिधान! आप मुझे अपना स्वीकार कर लीजिये। [2]
हे परम स्वामिनी! मैं सर्वत्र यही उद्घोष करती हूँ कि “मैं केवल श्री राधा की हूँ”, कृपा कर आप भी मुझे अपनी मान लीजिए। [3]
हे श्री वृन्दावन की महारानी! मेरी आपसे यही विनती है कि इस प्रेमसखी को अपनी दासियों की दासी होने का सौभाग्य प्रदान कीजिये। [4]
एहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू की,
जानि अति लघु दृष्टि कृपा की ढरीजियै। [1]
भूली हौं मारग तुम दीजिये बताय मोय,
करुनानिधान आप अपनाय लीजियै॥ [2]
सुन्दर सुजान एहो कहत फिरत तेरी,
तेहूँ अपनाई मोई आपनी गनीजियै। [3]
वृन्दावन राजरानी तुम सों पुकार मेरी,
प्रेमसखी दासिन की दासी हू करीजियै॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (43)
हे सुकुमारी (श्री राधा)! आप कुंज-बिहारी श्री कृष्ण के प्राणों की प्यारी हैं। मेरी अल्पता को जानकर अपनी कृपा-दृष्टि मुझ पर डालिये। [1]
मैं जीवन का वास्तविक मार्ग भूल गई हूँ, कृपा करके मुझे सही पथ दिखलाइये। हे करुणानिधान! आप मुझे अपना स्वीकार कर लीजिये। [2]
हे परम स्वामिनी! मैं सर्वत्र यही उद्घोष करती हूँ कि “मैं केवल श्री राधा की हूँ”, कृपा कर आप भी मुझे अपनी मान लीजिए। [3]
हे श्री वृन्दावन की महारानी! मेरी आपसे यही विनती है कि इस प्रेमसखी को अपनी दासियों की दासी होने का सौभाग्य प्रदान कीजिये। [4]

