सलोनी लागै बरसाने की भूमि।
गिरि के शिखर लाड़िली राजै, लता ललित रही झूमि॥ [1]
पुर रमणीक सुभग महलायत, रसिकन की जहाँ धूम।
'सरसमाधुरी' सखी सहेली, रहीं गलिन में घूम॥ [2]
- श्री सरस माधुरी
बरसाने की यह पावन भूमि अत्यंत सलोनी (सुंदर) लगती है। यहाँ पर्वत के शिखर पर लाड़िली जी (श्री राधा) विराजमान हैं और सुंदर लताएँ आनंद में झूम रही हैं। [1]
यह नगर अत्यंत रमणीक है और यहाँ के महल अत्यंत शोभायमान हैं, जहाँ रसिकों की मंडली भारी मात्रा में शोभायमान है। श्री सरसमाधुरी जी कहते हैं कि सखियाँ और सहेलियाँ यहाँ की गलियों में प्रेम-मग्न होकर घूम रही हैं। [2]
गिरि के शिखर लाड़िली राजै, लता ललित रही झूमि॥ [1]
पुर रमणीक सुभग महलायत, रसिकन की जहाँ धूम।
'सरसमाधुरी' सखी सहेली, रहीं गलिन में घूम॥ [2]
- श्री सरस माधुरी
बरसाने की यह पावन भूमि अत्यंत सलोनी (सुंदर) लगती है। यहाँ पर्वत के शिखर पर लाड़िली जी (श्री राधा) विराजमान हैं और सुंदर लताएँ आनंद में झूम रही हैं। [1]
यह नगर अत्यंत रमणीक है और यहाँ के महल अत्यंत शोभायमान हैं, जहाँ रसिकों की मंडली भारी मात्रा में शोभायमान है। श्री सरसमाधुरी जी कहते हैं कि सखियाँ और सहेलियाँ यहाँ की गलियों में प्रेम-मग्न होकर घूम रही हैं। [2]

