वृन्दावन नीरस रसिक बनावत।
जग परिहरि जो शरण गहत, ताकर सब दोष नसावत॥ [1]
अपनो करि निज गोद बिठावत, सब विध योग्य बनावत।
देकर युगल की सेवा उसको, नित्य निकुञ्ज बसावत॥ [2]
रसमय बनवत नित ता ऊपर, नव नव रस बरसावत।
‘राधाचरणदास’ बना ताही, रस सिन्धु डुबावत॥ [3]
- श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
श्री वृन्दावन धाम की यह अपार महिमा है कि वह शुष्क हृदय वाले व्यक्ति को भी प्रेम के रस से सराबोर कर रसिक बना देता है। जो संसार का मोह त्याग कर इस पावन भूमि की शरण में आता है, यह धाम उसके समस्त संताप और दोषों का अंत कर देता है। [1]
यह परम-पावन रज उसे अपना मानकर अपनी गोद में स्थान देती है और उसे हर प्रकार से भक्ति के मार्ग के योग्य बना देती है। पुनः उसे युगल सरकार की नित्य सेवा का दान देकर नित्य निकुञ्ज का शाश्वत वासी बना देती है। [2]
श्री धाम वृन्दावन जीव को रसमय बनाकर उस पर नित्य प्रति नवीन रसों की वर्षा करती है। श्री राधाचरणदास जी कहते हैं कि यह धाम साधक को प्रेम का स्वरूप प्रदान कर साक्षात् रस के महासागर में निमग्न कर देता है। [3]
जग परिहरि जो शरण गहत, ताकर सब दोष नसावत॥ [1]
अपनो करि निज गोद बिठावत, सब विध योग्य बनावत।
देकर युगल की सेवा उसको, नित्य निकुञ्ज बसावत॥ [2]
रसमय बनवत नित ता ऊपर, नव नव रस बरसावत।
‘राधाचरणदास’ बना ताही, रस सिन्धु डुबावत॥ [3]
- श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
श्री वृन्दावन धाम की यह अपार महिमा है कि वह शुष्क हृदय वाले व्यक्ति को भी प्रेम के रस से सराबोर कर रसिक बना देता है। जो संसार का मोह त्याग कर इस पावन भूमि की शरण में आता है, यह धाम उसके समस्त संताप और दोषों का अंत कर देता है। [1]
यह परम-पावन रज उसे अपना मानकर अपनी गोद में स्थान देती है और उसे हर प्रकार से भक्ति के मार्ग के योग्य बना देती है। पुनः उसे युगल सरकार की नित्य सेवा का दान देकर नित्य निकुञ्ज का शाश्वत वासी बना देती है। [2]
श्री धाम वृन्दावन जीव को रसमय बनाकर उस पर नित्य प्रति नवीन रसों की वर्षा करती है। श्री राधाचरणदास जी कहते हैं कि यह धाम साधक को प्रेम का स्वरूप प्रदान कर साक्षात् रस के महासागर में निमग्न कर देता है। [3]

