देहु निकुंज निवास स्वामिनी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (06)

देहु निकुंज निवास स्वामिनी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (06)

(राग भैरवी वा पीलू /जिला)
देहु निकुंज निवास स्वामिनी, भूल-चूक तजि लखि निज ओरी।
सुनी न देखी त्रिभुवन में कहुँ, तुम सम ललित मनोहर जोरी॥ [1]
युगल चन्दमुख निरखन के हित, प्यासे मरत हैं नयन चकोरी।
ललित लड़ैती देर करो जनि, हा हा पुरिवो आस किशोरी॥ [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (06)

हे स्वामिनी! मेरी समस्त भूल-चूक और दोषों को त्यागकर, अपनी ओर (अपनी कृपा की ओर) देखते हुए मुझे निकुंज में वास प्रदान कीजिए। मैंने तीनों लोकों में तुम्हारी जोड़ी (अर्थात् श्री राधा-कृष्ण) के समान ऐसी ललित और मनोहारी जोड़ी न तो कभी सुनी है और न ही देखी है। [1]

युगल सरकार के चन्द्रमा के समान मुख मण्डल का दर्शन करने के लिए मेरे ये चकोर रूपी नेत्र प्यासे मर रहे हैं। हे लाड़ली किशोरी! अब और अधिक देर न कीजिए; इस दीन की अभिलाषा को पूर्ण कीजिए। [2]