(सवैया)
चैन नहीं मन में न मलीन, सुनैन परे जल में न तई है। [1]
‘ताज’ कहै परयंक यो बाल, ज्यों चपकी माल विलाय गई है॥ [2]
नेकु विहाय न रैन कछु यह, जान भयानक भारि भई है। [3]
भौन में भानु समान सुदीपक, अगन में मनो आगि दई है॥ [4]
- ताज़ बेगम (ताज़ बीबी)
ताज़ बीबी वर्णन करती हैं कि श्री कृष्ण के वियोग की इस दारुण अवस्था में न तो चित्त को विश्राम है और न ही इन अश्रुपूरित नेत्रों को रोए बिना शांति प्राप्त होती है। [1]
शय्या पर मूर्च्छित अवस्था में उनका शरीर ऐसा आभासित होता है, मानो किसी सुकुमारी के वक्षस्थल पर सुशोभित वनमाला विरह-ताप से झुलसकर वहीं अंतर्धान हो गई हो। [2]
विरह की घड़ी में एक पल व्यतीत करना भी दूभर है; रात्रि का प्रत्येक प्रहर अत्यंत भयावह और कष्टकारी प्रतीत होता है। [3]
भवन में सूर्य के समान प्रकाश देने वाले ये सुंदर दीपक भी विरहाग्नि में दग्ध हृदय के लिए मानो आग में घी डालने का कार्य कर रहे हैं। [4]
चैन नहीं मन में न मलीन, सुनैन परे जल में न तई है। [1]
‘ताज’ कहै परयंक यो बाल, ज्यों चपकी माल विलाय गई है॥ [2]
नेकु विहाय न रैन कछु यह, जान भयानक भारि भई है। [3]
भौन में भानु समान सुदीपक, अगन में मनो आगि दई है॥ [4]
- ताज़ बेगम (ताज़ बीबी)
ताज़ बीबी वर्णन करती हैं कि श्री कृष्ण के वियोग की इस दारुण अवस्था में न तो चित्त को विश्राम है और न ही इन अश्रुपूरित नेत्रों को रोए बिना शांति प्राप्त होती है। [1]
शय्या पर मूर्च्छित अवस्था में उनका शरीर ऐसा आभासित होता है, मानो किसी सुकुमारी के वक्षस्थल पर सुशोभित वनमाला विरह-ताप से झुलसकर वहीं अंतर्धान हो गई हो। [2]
विरह की घड़ी में एक पल व्यतीत करना भी दूभर है; रात्रि का प्रत्येक प्रहर अत्यंत भयावह और कष्टकारी प्रतीत होता है। [3]
भवन में सूर्य के समान प्रकाश देने वाले ये सुंदर दीपक भी विरहाग्नि में दग्ध हृदय के लिए मानो आग में घी डालने का कार्य कर रहे हैं। [4]

