निपट प्रबल साधन करें, तऊ मिलै तन त्याग।
बिन साधन तन सहत ही, मिलै चढ़े रस पाग॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (8)
श्री धाम वृन्दावन की अपार महिमा का वर्णन करते हुए श्री प्रिया दास जी कहते हैं कि कठिन साधनाओं से जहाँ अंत में केवल देह-त्याग ही होता है, भगवद्-प्रेम होना तो बहुत दूर की बात है; वहीं वृन्दावन-वास के प्रभाव से तन के कठोर साधन किए बिना देहाभिमान स्वतः ही गल जाता है और भगवद्-प्रेम की पाग (मगनता) स्वयं ही चढ़ जाती है।
बिन साधन तन सहत ही, मिलै चढ़े रस पाग॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (8)
श्री धाम वृन्दावन की अपार महिमा का वर्णन करते हुए श्री प्रिया दास जी कहते हैं कि कठिन साधनाओं से जहाँ अंत में केवल देह-त्याग ही होता है, भगवद्-प्रेम होना तो बहुत दूर की बात है; वहीं वृन्दावन-वास के प्रभाव से तन के कठोर साधन किए बिना देहाभिमान स्वतः ही गल जाता है और भगवद्-प्रेम की पाग (मगनता) स्वयं ही चढ़ जाती है।

