मो निरधनि कौ धन गिरिधारी - रसिक वाणी

मो निरधनि कौ धन गिरिधारी - रसिक वाणी

मो निरधनि कौ धन गिरिधारी।
मेरी छगन-मगन मनमोहन, मम आँगन कौ चंद बिहारी॥ [1]
लखि याकौ मुख-चंद जियत हौं, या बिन सब जग में अँधियारी।
या के बदले जो कछु चाहें, देऊँ रतन-धेनु धन भारी॥ [2]

- रसिक वाणी

मुझ अकिंचन की एकमात्र पूँजी मेरे गिरिधारी ही हैं। मेरे चित्त को हरने वाले वे आनंदकंद बिहारी जी मेरे जीवन-प्रांगण के शीतल चंद्रमा के समान हैं। [1]

उनके मुख-चंद्र की मनमोहक छवि का दर्शन ही मेरे जीवन का आधार है, क्योंकि उनके अभाव में यह संपूर्ण जगत अंधकारमय भासता है। उनके सान्निध्य के लिए मैं बहुमूल्य रत्न, कामधेनु तुल्य गौएँ और अटूट संपत्ति— सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर हूँ। [2]