मैं जानी मैं जानी लडैती जू - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (55)

मैं जानी मैं जानी लडैती जू - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (55)

मैं जानी मैं जानी, लडैती जू मैं जानी।
तुम तो परम उदार किसोरी, अद्भुत हित की खानी॥ [1]
छिन छिन रंग बढ़ै अति भारी, रहौ प्रेम सुख सानी।
श्रीहरिदासी रसिक सिरोमनि, मिलि बिलसन की बानी॥ [2]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (55)

हे लाड़िली जू! अब मैंने आपके वास्तविक स्वरूप और महिमा को जान लिया है। हे किशोरी जी! आप अत्यंत उदारमयी हैं और विलक्षण प्रेम एवं आनंद की अक्षय निधि हैं। [1]

आपका प्रेम-रस प्रतिपल नवीन और प्रगाढ़ होता जाता है तथा आप सदैव दिव्य रस में तन्मय रहती हैं। रसिक शिरोमणि श्री स्वामी हरिदास जी द्वारा प्रतिपादित इस परंपरा में प्रिया-प्रियतम के अखंड नित्य-विहार की वह विशिष्ट पद्धति है, जिसमें समस्त रसिक जन सदैव डूबे रहते हैं। [2]