इतनौं कह्यौ हमारौ कीजे - श्री हित चतुर्भुजदास

इतनौं कह्यौ हमारौ कीजे - श्री हित चतुर्भुजदास

इतनौं कह्यौ हमारौ कीजे।
वृन्दाविपिन लसत अवनी पर, ताहि न क्यों निज मन में दीजे॥ [1]
झनक झनक कुंजनि प्रति विहरत, ललना लाल प्रेम रस भीजे।
ऐसौ विपिन कल्पवृक्षनि को, दास चतुर्भुज सब सुख लीजे॥ [2]

- श्री हित चतुर्भुजदास

हे प्रिया-प्रियतम! मेरी यह लघु प्रार्थना स्वीकार कीजिये। जिस प्रकार श्री वृन्दावन धाम इस भूतल पर साक्षात् सुशोभित है, उसी प्रकार आप इस परम पावन धाम को मेरे हृदय-कमल में भी प्रतिष्ठित कर दीजिये। [1]

जहाँ प्रत्येक निकुंज में आप दोनों युगल-किशोर प्रेमामृत में सराबोर होकर केलि-विलास कर रहे हैं और आपके नूपुरों की 'झनक-झनक' ध्वनि निरंतर गुंजायमान है। श्री हित चतुर्भुजदास जी कहते हैं कि मुझे भी उस साक्षात कल्प-वृक्ष सदृश वृन्दावन के अलौकिक प्रेम-रस का आस्वादन प्रदान कीजिये। [2]