(दोहा)
नषसिष सुषमा के दोउ, रतनागर रसिकेस।
अद्भुत राधामाधवी, जोरी सहज सुदेस॥
(पद) [तिताल, राग-केदारौ]
राधामाधव अद्भुत जोरी।
सदा सनातन इक रस बिहरत, अविचल नवल किसोर-किसोरी॥ [1]
नष सिष सब सुषमा रतनागर, भरत रसिकवर हृदय सरोरी।
जै श्रीभट्ट कटक कर कुंडल, गंड वलय मिलि लसत हिलोरी॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (59)
(दोहा)
रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी नख से लेकर शिखा तक सौंदर्य की खान है। श्रीराधा और माधव की यह अद्भुत जोड़ी स्वाभाविक रूप से परम सुंदर और रसिकों के मन को मोह लेने वाली मनोहारी है।
(पद)
श्रीभट्टजी कहते हैं कि श्रीराधा-माधव की जोड़ी अत्यंत अद्भुत है, जो सदा एक ही प्रेम-रस में मग्न होकर अविचल नित्य-विहार करती है। [1]
उनका नख-शिख सौंदर्य समुद्र के समान है, जो रसिक-सखियों के हृदय रूपी सरोवर को अपनी माधुरी से भर देता है। जब वे गलबाँही देकर खड़े होते हैं, तब उनके हाथों के कंगन तथा कानों के कुंडल कपोलों पर सुशोभित होकर ऐसी शोभा बिखेरते हैं, मानो सौंदर्य की लहरें हिलोरें ले रही हों। श्रीप्रिया-प्रियतम की इस नख-शिख शोभा का दर्शन कर सखीस्वरूप श्रीभट्टजी आनंद-मग्न हो जाते हैं। [2]
नषसिष सुषमा के दोउ, रतनागर रसिकेस।
अद्भुत राधामाधवी, जोरी सहज सुदेस॥
(पद) [तिताल, राग-केदारौ]
राधामाधव अद्भुत जोरी।
सदा सनातन इक रस बिहरत, अविचल नवल किसोर-किसोरी॥ [1]
नष सिष सब सुषमा रतनागर, भरत रसिकवर हृदय सरोरी।
जै श्रीभट्ट कटक कर कुंडल, गंड वलय मिलि लसत हिलोरी॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (59)
(दोहा)
रसिकशेखर श्रीयुगलकिशोर की यह अद्भुत जोड़ी नख से लेकर शिखा तक सौंदर्य की खान है। श्रीराधा और माधव की यह अद्भुत जोड़ी स्वाभाविक रूप से परम सुंदर और रसिकों के मन को मोह लेने वाली मनोहारी है।
(पद)
श्रीभट्टजी कहते हैं कि श्रीराधा-माधव की जोड़ी अत्यंत अद्भुत है, जो सदा एक ही प्रेम-रस में मग्न होकर अविचल नित्य-विहार करती है। [1]
उनका नख-शिख सौंदर्य समुद्र के समान है, जो रसिक-सखियों के हृदय रूपी सरोवर को अपनी माधुरी से भर देता है। जब वे गलबाँही देकर खड़े होते हैं, तब उनके हाथों के कंगन तथा कानों के कुंडल कपोलों पर सुशोभित होकर ऐसी शोभा बिखेरते हैं, मानो सौंदर्य की लहरें हिलोरें ले रही हों। श्रीप्रिया-प्रियतम की इस नख-शिख शोभा का दर्शन कर सखीस्वरूप श्रीभट्टजी आनंद-मग्न हो जाते हैं। [2]

