या हृदय में आ वसें, व्रजरानी व्रज भूप।
और सुहाये क्या उसे, देख वह अद्भुत रूप॥
- श्री जगन्नाथ जी, वृंदावन दर्शन (10)
यदि ब्रजेश्वरी श्री राधा और ब्रजराज श्री कृष्ण स्वयं किसी जीव के हृदय-प्रांगण में विराजमान हो जाएँ, तो फिर उसे इस संसार का कोई भी विषय कैसे आकर्षित कर सकता है? वह जीव तो अपने हृदय में स्थित प्रिया-प्रियतम की उस अलौकिक छवि में पूर्णतः लीन हो जाता है, और संसार के अन्य सभी विषय उसे निरर्थक प्रतीत होने लगते हैं।
और सुहाये क्या उसे, देख वह अद्भुत रूप॥
- श्री जगन्नाथ जी, वृंदावन दर्शन (10)
यदि ब्रजेश्वरी श्री राधा और ब्रजराज श्री कृष्ण स्वयं किसी जीव के हृदय-प्रांगण में विराजमान हो जाएँ, तो फिर उसे इस संसार का कोई भी विषय कैसे आकर्षित कर सकता है? वह जीव तो अपने हृदय में स्थित प्रिया-प्रियतम की उस अलौकिक छवि में पूर्णतः लीन हो जाता है, और संसार के अन्य सभी विषय उसे निरर्थक प्रतीत होने लगते हैं।

