रसिकवर रसिकनी रस रासि।
रसिक-सुघर रसिकन की जीवनि, जुगल परस्पर हासि॥ [1]
कोक कला संगीत सिरोमनि, अँग अँग लावनि लासि।
इहि रस दंपति संपति पर बलि, विसद बिहारिनिदासि॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (74)
परम रसिकों में श्रेष्ठ श्री कृष्ण और रसिक शिरोमणि श्री राधा साक्षात् रस की राशि हैं। वे दोनों ही अत्यंत चतुर रसिक हैं और समस्त रसिक जनों के जीवन के आधार हैं, जो सदैव परस्पर हास-विलास में मग्न रहते हैं। [1]
वे प्रेम की कलाओं और संगीत विद्या में सर्वोपरि हैं, और उनके प्रत्येक अंग से दिव्य लावण्य और कांति छलक रही है। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि मैं इस रसमय दम्पति की इस अपार प्रेम-रस रूपी सम्पत्ति पर स्वयं को न्यौछावर करता हूँ। [2]
रसिक-सुघर रसिकन की जीवनि, जुगल परस्पर हासि॥ [1]
कोक कला संगीत सिरोमनि, अँग अँग लावनि लासि।
इहि रस दंपति संपति पर बलि, विसद बिहारिनिदासि॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (74)
परम रसिकों में श्रेष्ठ श्री कृष्ण और रसिक शिरोमणि श्री राधा साक्षात् रस की राशि हैं। वे दोनों ही अत्यंत चतुर रसिक हैं और समस्त रसिक जनों के जीवन के आधार हैं, जो सदैव परस्पर हास-विलास में मग्न रहते हैं। [1]
वे प्रेम की कलाओं और संगीत विद्या में सर्वोपरि हैं, और उनके प्रत्येक अंग से दिव्य लावण्य और कांति छलक रही है। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि मैं इस रसमय दम्पति की इस अपार प्रेम-रस रूपी सम्पत्ति पर स्वयं को न्यौछावर करता हूँ। [2]

