प्यारी को श्रृंगार करत नंदलाला - श्री पुरुषोत्तम जी

प्यारी को श्रृंगार करत नंदलाला - श्री पुरुषोत्तम जी

प्यारी को श्रृंगार करत नंदलाला।
बार बार मैं मोती पोहे, कन बिच झलके बाला॥ [1]
कलीदार जरी को लहँगा, ऊपर सुर्ख दुशाला।
पुरषोत्तम प्रभु रसिक शिरोमणि, छबि निरखत ब्रजबाला॥ [2]

- श्री पुरुषोत्तम जी

नन्दलाल (श्री कृष्ण) स्वयं अपनी प्रियतमा श्री राधा का श्रृंगार कर रहे हैं। वे बार-बार अपने हाथों से मोतियों की माला पिरो रहे हैं और उनके कानों में आभूषण अथवा लटों को सँवार रहे हैं। [1]

फिर वे श्री राधा को कलियों-सा जरीदार लहंगा धारण कराते हैं और ऊपर लाल रंग का रेशमी दुशाला ओढ़ाते हैं। श्री पुरुषोत्तम दास जी कहते हैं कि रसिकों में शिरोमणि प्रभु श्री कृष्ण जब इस प्रकार श्री राधा महारानी जू का श्रृंगार करते हैं, तो ब्रज की गोपिकाएँ उस अद्भुत छवि को निहारती ही रह जाती हैं। [2]