इन्द्र-मद-मर्दन दुर्ग - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (5)

इन्द्र-मद-मर्दन दुर्ग - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (5)

(कवित्त)
इन्द्र-मद-मर्दन दुर्ग गिरि गोबर्द्धन है,
अमृत समान बहै यमुना का पानी है। [1]
प्रेम का प्रकाश यहीं रासका विकास हुआ,
जिसकी अमर एक उत्तम कहानी है॥ [2]
व्रज-नव-युवराज हैं राज्य करते जहाँ,
राधिका समान सर्व श्रेष्ठ महारानी है। [3]
प्रीति की पताका है उड़ती राज मन्दिर पै,
वृन्दावन प्रेम की पवित्र राजधानी है॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (5)

गिरिराज गोवर्धन वह दुर्ग है जिसने इन्द्र के अभिमान का मर्दन किया था। श्री यमुना जी का जल अमृत के समान प्रवाहित होता है। [1]

यहीं पर दिव्य प्रेम का प्रकाश हुआ है और महारास का प्राकट्य भी यहीं हुआ है, जिसकी पावन कथा आज भी अमर और सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। [2]

जहाँ ब्रज के नव-युवराज श्री कृष्ण राज्य करते हैं और जहाँ श्री राधिका जैसी सर्वोपरि महारानी विराजमान हैं। [3]

जहाँ के राज-मन्दिर पर सदैव निस्वार्थ प्रेम की ध्वजा फहराती रहती है; ऐसा यह श्री वृन्दावन धाम दिव्य प्रेम की पवित्र राजधानी है। [4]