कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (18)

कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (18)

(राग सारंग)
कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ।
मोसे नीच पोच कौं अनत न, हरि बिनु और न ठाउँ॥ [1]
सुख पुंजनि कुंजनि के देखत, विषय विषै क्यों पाउँ।
एक आगि को डाढ्यौ दूजी, आगि माँझ न बुझाउँ॥ [2]
एक प्रसन्न न मोपर निसि दिन, छिन छिन सबै कुदाउँ।
राधारवन सरन बिनु अब हौं, काके पेट समाउँ॥ [3]
भोजन छाजन की चिंता नहिं, मरिवेहु न डराउँ ।
सिर पर सिंदुर व्यास धरयौ अब, ह्वै है स्याम सहाउँ॥ [4]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (18)

मैं इस पावन श्री वृन्दावन धाम को त्याग कर कहाँ जाऊँ? मुझ जैसे अधम और तुच्छ प्राणी के लिए श्री कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई स्थान नहीं है। [1]

वृन्दावन के इन आनंदमयी कुंजों के दर्शन करने के पश्चात्, मैं पुनः सांसारिक विषयों के विष में क्यों पड़ूँ? मैं पहले ही संसार की आग में जल चुका हूँ, अब पुनः उसी आग में अपनी तृप्ति ढूँढने की मूर्खता नहीं करूँगा। [2]

दुनिया का कोई भी व्यक्ति मुझ पर प्रसन्न नहीं है, और प्रतिक्षण सभी ने मेरे साथ विश्वासघात किया है। अब श्री राधारमण देव की शरण के बिना मुझे और कौन आश्रय देगा? [3]

मुझे अब अपने भोजन या वस्त्र की कोई चिंता नहीं है, और न ही मुझे मृत्यु का भय है। श्री व्यास जी कहते हैं कि अब मैंने अपने मस्तक पर वृन्दावन की वह सिन्दूर-रूपी रज धारण कर ली है, और अब श्री श्यामसुन्दर स्वयं मेरे रक्षक और सहायक होंगे। [4]