कण-कण पै वारौं यहाँ, कोटिन तन मन प्रान।
सो रज दूर न डार तू, नैंकु निहारौ मान॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर, सोहनी महिमा (435.8)
श्री हित भोरी सखी जी कहती हैं — अरी सोहनी! मैं इस वृन्दावन की पावन रज के कण-कण पर अपने कोटि-कोटि तन, मन और प्राण न्यौछावर कर देने को तत्पर हूँ और तू इस दिव्य रज को हटाकर दूर फेंकने का प्रयास कर रही है। तू किंचित विचार कर और मेरी इस बात को मान ले।
सो रज दूर न डार तू, नैंकु निहारौ मान॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर, सोहनी महिमा (435.8)
श्री हित भोरी सखी जी कहती हैं — अरी सोहनी! मैं इस वृन्दावन की पावन रज के कण-कण पर अपने कोटि-कोटि तन, मन और प्राण न्यौछावर कर देने को तत्पर हूँ और तू इस दिव्य रज को हटाकर दूर फेंकने का प्रयास कर रही है। तू किंचित विचार कर और मेरी इस बात को मान ले।

