प्यारी के पाँइ लाल जावक दैन - श्री नागरीदास

प्यारी के पाँइ लाल जावक दैन - श्री नागरीदास

प्यारी के पाँइ लाल जावक दैन,
चरन कमल चित हित लगाइ। [1]
सींक सनेह संवारि स्याम,
घन लिखत चित्र बहु विधि बनाइ॥ [2]
नख मनि जोति निरखि विथकित भये,
सिथिल भये रंग रँग्यौ न जाइ। [3]
'नागरीदासि' हंसि कहत कुंवरि यौं,
रहौं जु रहौ पग रही है छिपाइ॥ [4]

- श्री नागरीदास

प्राण-प्रियतम श्री श्यामसुन्दर अपनी स्वामिनी श्री राधा के सुकुमार चरण-कमलों में अत्यंत अनुरागपूर्वक लाल महावर (जावक) सजा रहे हैं। [1]

वे प्रेममयी तूलिका (कलम) को बड़ी निपुणता और सावधानी से सँवारकर, श्री प्रिया जी के चरणों पर विलक्षण पत्रावली और अद्भुत चित्रों का अंकन करते हैं। [2]

किन्तु ज्यों ही उनकी दृष्टि श्री राधा के नख-मणियों की दिव्य आभा पर पड़ती है, वे प्रेमातिरेक में अपनी सुध-बुध खो देते हैं। उनके हाथ जड़ हो जाते हैं और वे भाव-विह्वलता में चाहकर भी महावर का रंग नहीं लगा पाते। [3]

श्री नागरीदास जी कहते हैं कि तब किशोरी जी मंद हास्य के साथ श्यामसुन्दर से कहती हैं— “अब रहने दो”, और ऐसा कहकर वे अपने चरणों को समेटकर छिपा लेती हैं। [4]