भजन्ति राधिकां येतु ते- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (91)

भजन्ति राधिकां येतु ते- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (91)

भजन्ति राधिकां येतु ते नित्यं तत्समीपगा।
अणुमात्रं न विच्छिन्ना सखीनामंशका हिते॥

- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (91)

जो श्री राधिका का नित्य भजन करते हैं, वे सदा श्री राधिका के समीप ही रहते हैं। वे एक क्षण के लिए भी उनसे विलग नहीं होते अथवा यों कहें कि वे अष्ट सखियों के ही अंशावतारी हैं।