माननि अब जिन कीजै मान - श्री मानदासी (शुक संप्रदाय)

माननि अब जिन कीजै मान - श्री मानदासी (शुक संप्रदाय)

(राग-सोरठ)
माननि अब जिन कीजै मान।
अति मन व्याकुल सनमुख ठाडै, प्रीतम श्याम सुजान॥ [1]
रंग भरी सुख यामिनि विलसौ, वृथा भौंह न तान।
'मानदासि' गहि चरण मनावै, तजो हठली बान॥ [2]

- श्री मानदासी (शुक संप्रदाय)

हे मानिनी (श्री राधा)! कृपा कर अब आप अपने मान को त्याग दीजिए। आपके प्रियतम चतुर श्यामसुन्दर अत्यंत व्याकुल मन से आपके सम्मुख खड़े हैं। [1]

आनंद से भरी इस सुखमयी रात्रि का विलास कीजिये, अपनी भौंहों को व्यर्थ ही क्रोध में मत तानिये। श्री मानदासि कहती हैं कि प्रियतम स्वयं आपके चरण पकड़कर आपको मना रहे हैं, अतः अब आप अपनी इस हठ को छोड़ दीजिये। [2]