और कहाँ ते सुमरिये, लीला रास विलास।
रा अक्षर के कहत ही, होत कम्प अरु स्वास॥
- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (112)
श्री प्रिया-प्रियतम के इस रास-विलास की लीला इतनी अगाध है कि वे मेरी सामर्थ्य से परे है। उनका पूर्ण स्मरण तो दूर, यहाँ तो ऐसी दशा हो जाती है कि ‘राधा’ नाम के केवल ‘रा’ अक्षर के उच्चारण मात्र से ही हृदय में अष्ट सात्त्विक भाव प्रकट हो जाते हैं और शरीर में कंपन, रोमांच आदि होने लगते हैं।
रा अक्षर के कहत ही, होत कम्प अरु स्वास॥
- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (112)
श्री प्रिया-प्रियतम के इस रास-विलास की लीला इतनी अगाध है कि वे मेरी सामर्थ्य से परे है। उनका पूर्ण स्मरण तो दूर, यहाँ तो ऐसी दशा हो जाती है कि ‘राधा’ नाम के केवल ‘रा’ अक्षर के उच्चारण मात्र से ही हृदय में अष्ट सात्त्विक भाव प्रकट हो जाते हैं और शरीर में कंपन, रोमांच आदि होने लगते हैं।

