(राग धनाश्री)
अरी, तेरी सहज की मुसिक्यान, मोहन मोहि लीनो।
जाको जस रटत सकल जग सजनी, सो तेरौं आधीनो॥ [1]
औरु सषा घर किऐ रहत है, आपुन पौ तजि दीनो।
“नंददास” प्रभु बाँकी-चितवन नै, टौंना सो कछु कीनों॥ [2]
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (68)
इस पद में सखियाँ श्री राधा की सुंदरता और उनके प्रति श्री कृष्ण के समर्पण का वर्णन करती हुई कहती हैं कि हे सखी! तेरी सहज मनमोहक मुस्कान ने श्री कृष्ण को मोह लिया है। सारा संसार जिनका यश गाता है, वे श्री कृष्ण अब तुम्हारे अधीन हैं। [1]
उन्होंने अन्य सभी सखियों एवं सखाओं को छोड़कर स्वयं को तुम्हें सौंप दिया है। श्री नंददास जी कहते हैं कि आपकी तिरछी चितवन ने ऐसा जादू किया है कि प्रभु गिरिधर लाल पूरी तरह तुम्हारे वश में हो गए हैं। [2]
अरी, तेरी सहज की मुसिक्यान, मोहन मोहि लीनो।
जाको जस रटत सकल जग सजनी, सो तेरौं आधीनो॥ [1]
औरु सषा घर किऐ रहत है, आपुन पौ तजि दीनो।
“नंददास” प्रभु बाँकी-चितवन नै, टौंना सो कछु कीनों॥ [2]
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (68)
इस पद में सखियाँ श्री राधा की सुंदरता और उनके प्रति श्री कृष्ण के समर्पण का वर्णन करती हुई कहती हैं कि हे सखी! तेरी सहज मनमोहक मुस्कान ने श्री कृष्ण को मोह लिया है। सारा संसार जिनका यश गाता है, वे श्री कृष्ण अब तुम्हारे अधीन हैं। [1]
उन्होंने अन्य सभी सखियों एवं सखाओं को छोड़कर स्वयं को तुम्हें सौंप दिया है। श्री नंददास जी कहते हैं कि आपकी तिरछी चितवन ने ऐसा जादू किया है कि प्रभु गिरिधर लाल पूरी तरह तुम्हारे वश में हो गए हैं। [2]

