जद्यपि हम सब भाँति ही - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (16)

जद्यपि हम सब भाँति ही - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (16)

जद्यपि हम सब भाँति ही, कुटिल कूर मतिमंद।
तदपि उधारहु देखि कै, अपनी दिसि नंद-नंद॥

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (16)

हे श्री कृष्ण! यद्यपि हम सर्वथा कपटी, निष्ठुर और मन्दबुद्धि हैं, तथापि आप हमारे दोषों पर ध्यान न देकर अपने परम कृपालु स्वभाव की ओर ही दृष्टि डालिये। आपकी अहैतुकी कृपा से ही हम जैसे अधम जीवों का उद्धार संभव है।