राधिके काहे करो हठ री - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (65)

राधिके काहे करो हठ री - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (65)

(सवैया)
राधिके काहे करो हठ री, सुनरी बर बोल पियूष से पी के। [1]
भौंहैं चढ़ाय कहा सतराइ के, नैन नचाय बकै गुन सीके॥ [2]
संभु सुरेश गनेश न पावत, प्रेम के डोरे बँधे तुब ही के। [3]
मानो मनायो पराऊँ परे, मन भावन मोहन भावते जी के॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (65)

हे श्री राधिके! आप व्यर्थ ही इतना हठ क्यों कर रही हैं? थोड़ा अपने प्रियतम के इन सुंदर वचनों को सुनिए, जो अमृत के समान मधुर हैं। [1]

आप अपनी भौंहें चढ़ाकर क्यों बैठी हैं और अपनी आँखों को नचाकर ऐसे रूखे वचन क्यों बोल रही हैं, जिन्हें आपने न जाने कहाँ से सीखा है? [2]

जिन भगवान कृष्ण को शिव, इन्द्र और गणेश जैसे देवता भी प्राप्त नहीं कर पाते, वे केवल आपके प्रेम की डोर में बंधे हुए हैं। [3]

आपके मन को मोहने वाले मनमोहन आपके श्री चरणों में पड़कर आपको मना रहे हैं, अतः हे किशोरी जी! अब मान जाइये और उनका यह अनुनय स्वीकार कीजिये। [4]