जब तें लीन्हीं हरि की ओट।
हलुके भये भार से उतरे, डारी दई पापन की मोट॥ [1]
लेखा दिया साहु समुझाया, बहुरि न खाई जम की चोट।
कह मलूक बाजी जीती, गुरु प्रताप तें पाकी गोट॥ [2]
- श्री मलूक दास
जब से मैंने श्री हरि की शरण ली है, मैं भारी बोझ से मुक्त होकर हल्का हो गया हूँ और मैंने अपने पापों की उस भारी गठरी को उतार कर फेंक दिया है। [1]
मैंने अपने कर्मों का सारा लेखा-जोखा उस परम साहूकार (ईश्वर) को सौंप कर सुलझा लिया है, अब मुझे यमराज का दंड कभी नहीं सहना पड़ेगा। संत मलूकदास जी कहते हैं कि गुरु की कृपा के प्रताप से मैंने जीवन की बाज़ी जीत ली है। [2]
हलुके भये भार से उतरे, डारी दई पापन की मोट॥ [1]
लेखा दिया साहु समुझाया, बहुरि न खाई जम की चोट।
कह मलूक बाजी जीती, गुरु प्रताप तें पाकी गोट॥ [2]
- श्री मलूक दास
जब से मैंने श्री हरि की शरण ली है, मैं भारी बोझ से मुक्त होकर हल्का हो गया हूँ और मैंने अपने पापों की उस भारी गठरी को उतार कर फेंक दिया है। [1]
मैंने अपने कर्मों का सारा लेखा-जोखा उस परम साहूकार (ईश्वर) को सौंप कर सुलझा लिया है, अब मुझे यमराज का दंड कभी नहीं सहना पड़ेगा। संत मलूकदास जी कहते हैं कि गुरु की कृपा के प्रताप से मैंने जीवन की बाज़ी जीत ली है। [2]

