(राग कल्यान)
बचन दै मान न करौं।
मन बच क्रम तीन हूँ तें न टरौं॥ [1]
तेरेई कियें मान व्यापि होत
तन कहि कैसें कैं भरौं।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
कहत री प्यारी कैसें कैं लरौं॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (59)
प्रियतम बाँके बिहारी श्री राधा रानी से कहते हैं— हे प्यारीजू! वचन दीजिये कि आप कभी मान न करेंगी। मन से कभी मान नहीं करेंगी, वचनों से कभी रुखाई न बरतेंगी, एवं किसी क्रिया द्वारा अर्थात् भौहों को टेड़ी करके मुझे डरायेंगी नहीं। [1]
आपके द्वारा किए गए मान के कारण मेरा हृदय व्याकुल रहता है। हे स्वामिनी! आप ही कहें कि मैं इस असहनीय पीड़ा को कैसे सहूँ? इस विरह-व्यथित शरीर को मैं कैसे सम्भालूँ? श्री हरिदास जी की स्वामिनी श्यामा जू से कुंजबिहारी कह रहे हैं— आपके संग किया हुआ विहार ही मेरा आहार है, मैं सदा आपके अधीन हूँ। मैं स्वप्न में भी अपनी किसी चेष्टा से आपका अहित करने या आपसे कलह करने का विचार नहीं कर सकता; अतः कृपा करके ऐसी स्थिति ही न आने दें कि आप मुझसे मान करें। [2]
बचन दै मान न करौं।
मन बच क्रम तीन हूँ तें न टरौं॥ [1]
तेरेई कियें मान व्यापि होत
तन कहि कैसें कैं भरौं।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
कहत री प्यारी कैसें कैं लरौं॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (59)
प्रियतम बाँके बिहारी श्री राधा रानी से कहते हैं— हे प्यारीजू! वचन दीजिये कि आप कभी मान न करेंगी। मन से कभी मान नहीं करेंगी, वचनों से कभी रुखाई न बरतेंगी, एवं किसी क्रिया द्वारा अर्थात् भौहों को टेड़ी करके मुझे डरायेंगी नहीं। [1]
आपके द्वारा किए गए मान के कारण मेरा हृदय व्याकुल रहता है। हे स्वामिनी! आप ही कहें कि मैं इस असहनीय पीड़ा को कैसे सहूँ? इस विरह-व्यथित शरीर को मैं कैसे सम्भालूँ? श्री हरिदास जी की स्वामिनी श्यामा जू से कुंजबिहारी कह रहे हैं— आपके संग किया हुआ विहार ही मेरा आहार है, मैं सदा आपके अधीन हूँ। मैं स्वप्न में भी अपनी किसी चेष्टा से आपका अहित करने या आपसे कलह करने का विचार नहीं कर सकता; अतः कृपा करके ऐसी स्थिति ही न आने दें कि आप मुझसे मान करें। [2]

