कान्त द्वैत अद्वैत नहि, नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ।
वेद-विवादनि सों परे, सो रसिकन कौ इष्ट॥
- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (5)
श्रीयुगल सरकार न तो द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत और न ही विशिष्टाद्वैत जैसे दार्शनिक मतों की सीमाओं में आबद्ध हैं। वे वेदों के समस्त तार्किक विवादों से परे, पूर्णतः स्वतंत्र और रसमय हैं। रसिकों के लिए तो केवल श्यामा-श्याम की यह परम-प्रिय जोड़ी ही एकमात्र उपास्य और आधार है।
वेद-विवादनि सों परे, सो रसिकन कौ इष्ट॥
- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (5)
श्रीयुगल सरकार न तो द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत और न ही विशिष्टाद्वैत जैसे दार्शनिक मतों की सीमाओं में आबद्ध हैं। वे वेदों के समस्त तार्किक विवादों से परे, पूर्णतः स्वतंत्र और रसमय हैं। रसिकों के लिए तो केवल श्यामा-श्याम की यह परम-प्रिय जोड़ी ही एकमात्र उपास्य और आधार है।

