(राग धनाश्री)
राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल।
तैं निजु भजन कनक तन जोवन, लियौ मनोहर मोल॥ [1]
अधर निरंग अलक लट छूटी, रंजित पीक कपोल।
तूँ रस मगन भई नहिं जानत, ऊपर पीत निचोल॥ [2]
कुच जुग पर नख रेख प्रकट मानौं,संकर सिर ससि टोल।
(जै श्री) हित हरिवंश कहत कछु भामिनि, अति आलस सौं बोल॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (23)
हित सखी (श्री हरिवंश महाप्रभु) भाव-विभोर होकर कहती हैं— हे प्यारी राधे! आज तुम्हारे नेत्र अत्यंत चंचल और मदमाते हैं। तुमने अपनी अनन्य प्रीति, अनुराग और कंचन के समान कांतिवान गौर देह से रसिकलाल श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है। [1]
हे सखी! तुम्हारे अधरों की लालिमा क्षीण हो गई है, केश-पाश बिखरे हुए हैं और कपोलों पर श्यामसुन्दर के अधरों की पीक के चिह्न अंकित हैं। तुम प्रेम-रस में ऐसी मग्न हो कि तुम्हें यह भी सुध नहीं रही कि तुमने अपने नीलांबर के स्थान पर प्रियतम का पीतांबर ओढ़ रखा है। [2]
श्रीहित हरिवंश चंद्र वर्णन करते हैं— हे भामिनि! तुम्हारे वक्षस्थल पर सुशोभित नख-रेखाएँ ऐसी प्रतीत हो रही हैं, मानो भगवान शिव के मस्तक पर एक साथ अनेक द्वितीया के चंद्रमा सुशोभित हों। और तुम दिव्य आलस्य (मद) में भरकर जो मृदु-मधुर अस्पष्ट शब्द बोल रही हो, वे अत्यंत मनोहारी हैं। [3]
राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल।
तैं निजु भजन कनक तन जोवन, लियौ मनोहर मोल॥ [1]
अधर निरंग अलक लट छूटी, रंजित पीक कपोल।
तूँ रस मगन भई नहिं जानत, ऊपर पीत निचोल॥ [2]
कुच जुग पर नख रेख प्रकट मानौं,संकर सिर ससि टोल।
(जै श्री) हित हरिवंश कहत कछु भामिनि, अति आलस सौं बोल॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (23)
हित सखी (श्री हरिवंश महाप्रभु) भाव-विभोर होकर कहती हैं— हे प्यारी राधे! आज तुम्हारे नेत्र अत्यंत चंचल और मदमाते हैं। तुमने अपनी अनन्य प्रीति, अनुराग और कंचन के समान कांतिवान गौर देह से रसिकलाल श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है। [1]
हे सखी! तुम्हारे अधरों की लालिमा क्षीण हो गई है, केश-पाश बिखरे हुए हैं और कपोलों पर श्यामसुन्दर के अधरों की पीक के चिह्न अंकित हैं। तुम प्रेम-रस में ऐसी मग्न हो कि तुम्हें यह भी सुध नहीं रही कि तुमने अपने नीलांबर के स्थान पर प्रियतम का पीतांबर ओढ़ रखा है। [2]
श्रीहित हरिवंश चंद्र वर्णन करते हैं— हे भामिनि! तुम्हारे वक्षस्थल पर सुशोभित नख-रेखाएँ ऐसी प्रतीत हो रही हैं, मानो भगवान शिव के मस्तक पर एक साथ अनेक द्वितीया के चंद्रमा सुशोभित हों। और तुम दिव्य आलस्य (मद) में भरकर जो मृदु-मधुर अस्पष्ट शब्द बोल रही हो, वे अत्यंत मनोहारी हैं। [3]

