(राग मल्हार)
प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूं।
तृण तोरूं या चन्द बदन पै, राई नोन उतारूं॥ [1]
निजकर करूं श्रृंगार तिहारो, मुख पै भ्रमर बिडारूं।
नारायण जब तुम कछु गावो, मैं ढिंग साज सँवारूं॥ [2]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, प्रेम परीक्षा लीला (21)
सखी के श्री राधा के प्रति वचन -
हे प्यारी जू! मेरी यही अभिलाषा है कि मैं नित-निरंतर आपको इसी प्रकार निहारता रहूँ। आपके इस चंद्रमा के समान सुंदर मुखमंडल की नज़र उतारने के लिए मैं तिनका तोडूँ और राई-नमक न्योछावर करूँ। [1]
मैं अपने ही हाथों से आपका शृंगार करूँ और आपके मुख-कमल के समीप मँडराते भ्रमरों को हटाता रहूँ। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि हे स्वामिनी! जब आप मधुर स्वर में कुछ गायन करें, तब मैं आपके निकट बैठकर वाद्य-यंत्रों का साज सँवारूँ। [2]
प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूं।
तृण तोरूं या चन्द बदन पै, राई नोन उतारूं॥ [1]
निजकर करूं श्रृंगार तिहारो, मुख पै भ्रमर बिडारूं।
नारायण जब तुम कछु गावो, मैं ढिंग साज सँवारूं॥ [2]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, प्रेम परीक्षा लीला (21)
सखी के श्री राधा के प्रति वचन -
हे प्यारी जू! मेरी यही अभिलाषा है कि मैं नित-निरंतर आपको इसी प्रकार निहारता रहूँ। आपके इस चंद्रमा के समान सुंदर मुखमंडल की नज़र उतारने के लिए मैं तिनका तोडूँ और राई-नमक न्योछावर करूँ। [1]
मैं अपने ही हाथों से आपका शृंगार करूँ और आपके मुख-कमल के समीप मँडराते भ्रमरों को हटाता रहूँ। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि हे स्वामिनी! जब आप मधुर स्वर में कुछ गायन करें, तब मैं आपके निकट बैठकर वाद्य-यंत्रों का साज सँवारूँ। [2]

