(राग खंजनाक्षी व आसावरी)
किशोरी मैं तो भली बुरी सो तेरी।
रहूँ विकल दिन रात विरह में, सुनियो अरज सवेरी॥ [1]
मन की बात छुपी नहिं तुम सों, करिये नाहिंन देरी।
अब जिन करो अबेर लड़ैती, रखिया चरणन नेरी॥ [2]
अवगुन मेरे सकल विसारो, जान आपनी चेरी।
“रूपमाधुरी” अपनी कीजै, प्रेम नजर भर हेरी॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (16)
हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए। [1]
मेरे मन की कोई भी बात आपसे छिपी नहीं है, इसलिए अब कृपा करने में विलम्ब न कीजिए। हे मेरी लाड़ली सरकार! अब और देर मत कीजिए और मुझे सदा अपने चरणों के समीप ही रखिए। [2]
मेरे समस्त अवगुणों को भुलाकर मुझे अपनी दासी स्वीकार कीजिये। श्री रूपमाधुरी कहते हैं कि अपनी प्रेममयी करुणा दृष्टि से निहार कर मुझे कैसे भी अपना बना लीजिये। [3]
किशोरी मैं तो भली बुरी सो तेरी।
रहूँ विकल दिन रात विरह में, सुनियो अरज सवेरी॥ [1]
मन की बात छुपी नहिं तुम सों, करिये नाहिंन देरी।
अब जिन करो अबेर लड़ैती, रखिया चरणन नेरी॥ [2]
अवगुन मेरे सकल विसारो, जान आपनी चेरी।
“रूपमाधुरी” अपनी कीजै, प्रेम नजर भर हेरी॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (16)
हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए। [1]
मेरे मन की कोई भी बात आपसे छिपी नहीं है, इसलिए अब कृपा करने में विलम्ब न कीजिए। हे मेरी लाड़ली सरकार! अब और देर मत कीजिए और मुझे सदा अपने चरणों के समीप ही रखिए। [2]
मेरे समस्त अवगुणों को भुलाकर मुझे अपनी दासी स्वीकार कीजिये। श्री रूपमाधुरी कहते हैं कि अपनी प्रेममयी करुणा दृष्टि से निहार कर मुझे कैसे भी अपना बना लीजिये। [3]

