दूलह मदनगोपाल राधा नव दुलही - श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (47)

दूलह मदनगोपाल राधा नव दुलही - श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (47)

(राग धनाश्री)
दूलह मदनगोपाल, राधा नव दुलही।
मानों तरु तमाल मिलि नूतन, कनक-बेलि उलही॥ [1]
रूप-भूप युबराज बिराजत, बैस किसोर एक तुलही।
मदनमोहन प्रभु सूर सु जीवनि, जिय में हुती सुलही॥ [2]

- श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत), सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (47)

श्री मदनगोपाल (कृष्ण) दूल्हा हैं और श्री राधा उनकी नवल दुलहन हैं। इन दोनों की युगल छवि ऐसी सुशोभित हो रही है, मानो किसी नवीन तमाल के वृक्ष से लिपटकर कोई कंचन (स्वर्ण) की बेल विकसित होकर लहरा रही हो। [1]

सौन्दर्य के साम्राज्य के अधिपति यह दिव्य युगल विराजमान हैं, जिनकी किशोर अवस्था और रूप एक-दूसरे के सर्वथा अनुरूप है। सूरदास मदनमोहन जी कहते हैं कि युगल सरकार ही मेरे जीवन के आधार हैं और आज उन्हें इस रूप में देख कर मेरे हृदय की अभिलाषा पूर्ण हो गई है। [2]