मन नग ताको दीजिये, जो प्रेम पारखी होय।
नातर रहिये मौन व्हे, काहे जीवन खोय॥
- गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (29)
अपने मन रूपी अनमोल रत्न को केवल उसी व्यक्ति को सौंपना चाहिए जो प्रेम का सच्चा पारखी अर्थात् रसिक संत हो। यदि कोई प्रेम की गहराई और मूल्य को समझने वाला न मिले, तो मौन धारण कर लेना ही श्रेष्ठ है। व्यर्थ के लोगों के पीछे अपना अनमोल जीवन नष्ट करने से क्या लाभ?
नातर रहिये मौन व्हे, काहे जीवन खोय॥
- गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (29)
अपने मन रूपी अनमोल रत्न को केवल उसी व्यक्ति को सौंपना चाहिए जो प्रेम का सच्चा पारखी अर्थात् रसिक संत हो। यदि कोई प्रेम की गहराई और मूल्य को समझने वाला न मिले, तो मौन धारण कर लेना ही श्रेष्ठ है। व्यर्थ के लोगों के पीछे अपना अनमोल जीवन नष्ट करने से क्या लाभ?

