ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि - श्री सूरदास, सूरसागर (1108)

ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि - श्री सूरदास, सूरसागर (1108)

(राग सारंग)
ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि ।
ग्वारनि के पनवारे चुनि-चुनि, उदर भरीजै सीथिनि॥ [1]
पैंड़े के सब बृच्छ बिराजत, छाया परम पुनीतनि ।
कुंज-कुंज-प्रति लोटि-लोटि, ब्रज-रज लागै रँग-रीतनि॥ [2]
निसि दिन निरखि जसोदा-नंदन, अरु जमुना-जल पीतनि।
परसत सूर होत मन पावन, दरसन करत अतीतनि॥ [3]

- श्री सूरदास, सूरसागर (1108)

ब्रह्मा कहते हैं— ब्रज की गलियों में बसने की रीति ऐसी ही होनी चाहिए जहाँ हम ब्रजवासियों और ग्वालों के जूठे पत्तलों से अन्न के दानों (सीथ) को चुन-चुनकर अपना पेट भरें। [1]

मेरी यह परम अभिलाषा है कि उन मार्गों पर मैं वास करूँ जहाँ बड़े-बड़े छायादार वृक्ष सुशोभित हो रहे हों। कुंज-कुंज में लोट-लोटकर अपने शरीर पर ब्रज की रज लगाऊँ, जिससे मेरा हृदय प्रेम-भक्ति के रंग में सराबोर हो जाए। [2]

वहाँ रहते हुए रात-दिन मैं श्री कृष्ण का दर्शन करूँ और यमुना-जल का पान करूँ। सूरदास कहते हैं कि यहाँ की भूमि की रज और यमुना जी के भावपूर्वक स्पर्श मात्र से मन परम पावन और निर्मल हो जाता है जिससे श्री कृष्ण के दर्शन सुलभ हो जाते हैं। [3]