तरनि तनया तीर लाल गिरिवरधरन - श्री ब्रजपति जी

तरनि तनया तीर लाल गिरिवरधरन - श्री ब्रजपति जी

(कवित्त)
तरनि-तनया तीर लाल गिरिवरधरन,
राधिका संग नृत्यत सुभग रास में। [1]
ततथेई ततथेई करत गति भेद सों,
पिय अंग-अंग मिलत सुंदरी ता समें॥ [2]
नंदनंदन निरख सुर सहित सुरनारि,
वेणु कल नाद सुन मोहे आकास में। [3]
थक्यौ घन चंद सब तारिका थक रहीं,
तान स्वर गान 'ब्रजपति' करत जा समें॥ [4]

- श्री ब्रजपति जी

यमुना जी के तट पर श्री गिरिधर लाल, श्री राधिका के साथ सुंदर रास मण्डल में नृत्य कर रहे हैं। [1]

वे विभिन्न गति और ताल के भेदों के साथ 'ततथेई-ततथेई' करते हुए नृत्य कर रहे हैं और उस समय प्रियतम श्यामसुंदर के अंग-अंग उस परम सुंदरी श्री राधा के अंगों से मिल रहे हैं। [2]

नन्दनन्दन श्री कृष्ण की इस शोभा को देखकर आकाश में देवताओं सहित देवांगनाएँ भी उनकी बाँसुरी की मधुर ध्वनि सुनकर मोहित हो रही हैं। [3]

श्री ब्रजपति कहते हैं कि जिस समय तान और स्वरों का दिव्य गान होता है, उस समय मेघ, चंद्रमा और समस्त तारागण भी मुग्ध होकर स्थिर हो जाते हैं। [4]