बिहारी जू है तुम लौ मेरी दौर - रूप कुँवरि जी

बिहारी जू है तुम लौ मेरी दौर - रूप कुँवरि जी

(राग सोरठ - ताल तिताला)
बिहारी जू है तुम लौ मेरी दौर॥ [1]
दीननको प्रभु राखत आये, हौ त्रिभुवन सिरमौर।
जो जन सरन भये तब स्वामी, तिनहिं दियो शुभ ठौर॥ [2]
मीरा आदि द्रौपदी सौरी, सबके राखे तौर।
रानी रूपकुंवरि सरनागत, करिये प्रभु अब गौर॥ [3]

- रूप कुँवरि जी

हे बाँकें बिहारी जी! आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं। [1]

हे तीनों लोकों के मुकुटमणि प्रभु! आप सदैव से ही दीन-दुखियों की लाज रखते आए हैं। हे स्वामी! जो भी जीव आपकी शरण में आया, आपने उसे अपनी परम पावन ठौर (शरण) प्रदान की है। [2]

आपने मीरा बाई, द्रौपदी और शबरी जैसे भक्तों की रक्षा की है। रानी रूपकुंवरि कहती हैं कि हे प्रभु! अब मैं भी आपकी शरणागत हूँ, मुझ पर भी अपनी करुणा दृष्टि कीजिए। [3]