नांमी नांम न भावई, तन-मन-मनसा प्राँन।
आसा दासि बिहार की, यों बसि रसिक निदाँन॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (132)
स्वामी हरिदास जी की रस-उपासना में हमारे रसिक-शेखर श्रीयुगल तन, मन, मनसा, एवं रोम-रोम से एकमात्र अखंड नित्य-विहार में ऐसे वशीभूत हुए रहते हैं कि इस विहार के अतिरिक्त उन्हें अपना नाम सुनना भी सुहाता नहीं। श्री श्यामा-कुंजबिहारी का सर्वस्व और जीवन-प्राण केवल यह नित्य-विहार ही है।
आसा दासि बिहार की, यों बसि रसिक निदाँन॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (132)
स्वामी हरिदास जी की रस-उपासना में हमारे रसिक-शेखर श्रीयुगल तन, मन, मनसा, एवं रोम-रोम से एकमात्र अखंड नित्य-विहार में ऐसे वशीभूत हुए रहते हैं कि इस विहार के अतिरिक्त उन्हें अपना नाम सुनना भी सुहाता नहीं। श्री श्यामा-कुंजबिहारी का सर्वस्व और जीवन-प्राण केवल यह नित्य-विहार ही है।

