लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि, दूरहि सों दुरियायौ।
जप वृतादि साधनन युगन सौं, ह्वै निराश बिसरायौ॥ [1]
अद्भुत आनंद-धार सहज ही, श्रवत पुराननि गायौ ।
सो राधा पग ललित रैन सौं, मन मैं लाय लगायौ॥ [2]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (32)
मैंने लोक-परलोक, परिवार के सुख और अनन्त भौतिक कामनाओं को दूर से ही त्याग दिया है। इतना ही नहीं, जप, व्रत तथा परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों से भी दीर्घकाल तक अभ्यास करने पर निराश होकर उन्हें छोड़ दिया है। [1]
पुराणों ने जिस अद्भुत और सहज आनंद की धारा का वर्णन किया है, उन श्री राधा महारानी के कोमल चरण-कमलों की रज में पूर्ण विश्वास कर, अपने मन में प्रेमपूर्वक धारण कर लिया है। [2]
जप वृतादि साधनन युगन सौं, ह्वै निराश बिसरायौ॥ [1]
अद्भुत आनंद-धार सहज ही, श्रवत पुराननि गायौ ।
सो राधा पग ललित रैन सौं, मन मैं लाय लगायौ॥ [2]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (32)
मैंने लोक-परलोक, परिवार के सुख और अनन्त भौतिक कामनाओं को दूर से ही त्याग दिया है। इतना ही नहीं, जप, व्रत तथा परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों से भी दीर्घकाल तक अभ्यास करने पर निराश होकर उन्हें छोड़ दिया है। [1]
पुराणों ने जिस अद्भुत और सहज आनंद की धारा का वर्णन किया है, उन श्री राधा महारानी के कोमल चरण-कमलों की रज में पूर्ण विश्वास कर, अपने मन में प्रेमपूर्वक धारण कर लिया है। [2]

